निरंतर चाहा था,हमेशा चाहूंगा
Posted by rajtela1,
06 September 2010
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Ghazal Shayri Kavita
सोच में डूबा था,ख्यालों में खोया था,
तुम को अब भी खोज रहा था
क्या नहीं किया,तुमको पाने के लिए,
खुद को भुला दिया,मंजिल पाने के लिए
हश्र क्या यही होना था मेरी कोशिशों का?
झूठ ही सही, मुस्करा ही देते,
मेरी कोशिशों का जवाब तो देते
मुझे गम नहीं है तेरी चाहत मैं,
जिन्दगी गवाने का,
आखरी मौक़ा यही बचा है,
तुम्हें लुभाने का
जान गंवाकर ही सही,तुमको पाऊँगा,
निरंतर चाहा था,हमेशा चाहूंगा
06-09-2010











