ये पत्थरों का शहर है,
अश्कों का क्या काम
जहाँ पत्थर के बुत रहते हों,
हंसी का क्या काम
जहाँ दिल ही नहीं,
दर्द का क्या काम
रंजो गम त्योंहार हो जहाँ,
खुशियों का क्या काम
जहाँ निरंतर हाथ मैं खंजर,
गुलदस्तों का क्या काम
नफरत की बस्ती मैं,
मोहब्बत का क्या काम
ये पत्थरों का शहर है....
06-09-2010











