एक नरेश ने अपने दरबार में सामंतों से पूछा, मांस सस्ता है या महंगा। सामंतों ने उत्तर दिया, सस्ता है। यह सुनकर राजकुमार बोला, पिताजी, मांस महंगा है। नरेश बोले, तुम अभी बालक हो, सामंतगण अनुभवी हैं। राजकुमार ने कहा, यदि आप कुछ दिन राजसभा में न आएं तो मैं इस बात को सिद्ध कर दूंगा कि किसकी बात ठीक है। दो दिन बाद राजकुमार एक सामंत के घर पहुंचे और बोले, पिताजी बीमार हैं। राजवैद्य कहते हैं कि शूर सामंत के हृदय का मांस चाहिए। कृपा करके आप अपने हृदय का दो तोला मांस दे दें। जो भी मूल्य चाहें, आपको दिया जाएगा। सामंत ने राजकुमार को एक बड़ी रकम भेंट की और कहा, आप मुझ पर दया करें। किसी दूसरे सामंत के पास पधारें। राजकुमार क्रमश: सभी सामंतों के पास गए। सबने उन्हें भारी भेंट देकर दूसरे के यहां जाने को कहा।
राजकुमार ने भेंट में प्राप्त विशाल धनराशि लाकर पिता के सामने रख दी और सारी बातें बता दीं। दूसरे दिन राजसभा में राजा आए और सामंतों से फिर पूछा, मांस सस्ता है या महंगा। सामंतों ने बात समझकर नजरें झुका लीं। तब राजकुमार ने कहा, अपना मांस संसार में दुर्लभ है। कोई लाख रुपए में भी इसे देना नहीं चाहता, किंतु दूसरे के शरीर के मांस का उसकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं। इसलिए हर कोई दूसरे से उसे खरीदना चाहता है। किंतु उस दूसरे के लिए भी तो अपना शरीर सर्वाधिक प्रिय है। सार यह है कि किसी भी प्राणी के साथ हिंसा नहीं करनी चाहिए क्योंकि सभी को अपने प्राण प्रिय हैं।
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अपने प्राण प्रिय हैं
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Guest_eacter from_*
, Jan 20 2011 12:45 PM
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