अकसर देखती हूं,
राहगीर, नाते-रिश्तेदार
और यहां तक कि
मेरे अपने दोस्त-यार…
उन्हें घूर-घूर कर देखते हैं,
उन की एक झलक को लालायित रहते हैं…
आज मैं
उन लालायित आत्माओं को
कहना चाहती हूं,
जिनके लिए वे अकसर मर्यादा भूल जाते हैं,
वह मेरे शरीर का हिस्सा भर हैं…
ठीक वैसे ही, जैसे
मेरे होंठ,
मेरी आंख
और मेरी नाक
या फिर मेरे पांव या हाथ…
इसी के साथ
मैं उनसे अनुरोध करती हूं…
मेरे मन में यह संशय न उठने दें
कि मैं नारी हूं या महज स्तनों का एक जोड़ा..
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मैं नारी हूं
Started by Shivani, Jan 19 2012 11:16 AM
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